लड़कियाँ जल्दी घर जाने के फेर में रहती है या फिर इन्हें देर रात तक काम करने में कंटाला आता हैं ये ताने हम लड़कियों के लिए आम बात हो चुकी है। सहकर्मी लड़कों को, लड़कियों को मिलनेवाले इस प्रिवलेज से हमेशा ही जलन रही हैं। नज़रिया उनका कोई ग़लत भी नहीं लगता। आखिर हम लड़कियाँ ही बराबरी की बातें करती हैं, समान तनख्वाह और सुविधाएं पाती हैं फिर काम में कोताही क्यों...
शायद इसी सवाल का जवाब हैं - सौम्या विश्वनाथन। देर रात तक काम करके घर लौट रही सौम्या की हत्या कर दी गई। हत्या कैसे हुई, किसने की, क्यों की ये अब तक रहस्य है। लेकिन, इस हत्या ने कई सवाल ज़रूर खड़े कर दिए हैं। ऑफ़िस से काम करके देर रात को घर लौट रही महिलाएं आखिर कितनी सुरक्षित हैं। सौम्या से पहले भी ऐसी कई घटनाएं हो चुकीं हैं। कॉल सेन्टर्स में काम करनेवाली लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्या की ख़बरें कहीं न कहीं से आ ही जाती हैं। कई बार ये बलात्कार करनेवाला इंसान कैब का ड्राइवर या सहकर्मी निकलता हैं। एक लड़की जो अपने पैरों पर खड़े होने का माद्दा रखती है, पुरुषों की इस दुनिया में ख़ुद को साबित करना चाहती है, उतना ही काम करना चाहती है जितना की कोई लड़का कर सकता है, प्रकृति के बनाएं नियमों से जूझती है लेकिन आखिर में रह जाती है सिर्फ़ एक चीज़ बनकर। जिसे देखकर विपरीत लिंग को उत्तेजना होती है और उस वक़्त वो उसे शांत करने का तरीक़ा मात्र रह जाती है। एक लड़की होने के नाते कई बार अपनी इस शारीरिक बनावट और दुर्बलता पर ऐसी खीज आती है कि लगता है क्यों ये अंतर... क्यों हमेशा ये कहा जाता है कि लड़कियों के कम कपड़ों को देखकर हम उत्तेजित हो जाते हैं। क्या लड़कों का अपना कोई विवेक नहीं, क्या संयम नाम की चीज़ से उनका कोई नाता नहीं हैं। कितनी बार किसी ने ये सुना है किसी लड़के को स्वील लेस में देखकर या बिना शर्ट में देखकर लड़की उत्तेजित हुई हो...
कितनी बार ऑफ़िस से देर रात को निकल रही लड़कियों से पुरुष सहकर्मियों ने ये कहा होगा कि ध्यान से जाना... या फिर ये कहा होगा कि पहुंच कर एक फ़ोन कर देना। हमारे समाज की मानसिकता तो कुछ ऐसी है कि देर रात काम करने लौट रही लड़की की हत्या होने पर भी ये कहा जाएगा कि - लड़की थी रात रूकना ही नहीं चाहिए था। ऐसा काम ही क्यों करना कि ये सब हो। इन बोलनेवालों में अगर जल्दी जाने पर ताना देनेवाले शामिल हो तो कोई आश्चर्य नहीं। आज भी लड़कियों के लिए टीचर का काम सबसे बेहतरीन माना जाता है। स्ट्रगल के दिनों में कई बार मुझसे भी ये कहा गया होगा कि मीडिया स्कूल में पढ़ाना क्यों शुरु नहीं कर देती हो बहुत गंदी जगह है ये। देर रात तक रूकना या फिर रात में काम करना आज के वक़्त में तक़रीबन सभी प्रोफ़ेशन का हिस्सा है। बावजूद इसके ऑफ़िसों में महिलाओं की सुरक्षा के अलग से कोई बंदोबस्त नहीं होते हैं। कैब में कितने लोग बैठेंगे या फिर पहले कौन उतरेगा इस बारे में बहुत ही कम संस्थाओं ने सोचा होगा। नियम बना दिए जाते हैं कि रात नौ बजे के बाद ड्रॉपिंग की सुविधा मिलेंगी। लेकिन, जिसने ये नियम बनाया है वो शायद ये नहीं जानता कि दिल्ली जैसे महानगर, देश की राजधानी में भी रात आठ बजे बसों में इक्का दुक्का लड़कियाँ नज़र आती हैं। रात तो रात दिन तक में कई बार हालात कुछ ऐसे हो जाते है कि लगता है क्या किया जाए।
सड़क पर चलते हुए फब्तियाँ सुनना, अपने घरों के ओटलों पर बैठे लड़कों के मुंह से गाने सुनना, ऑफ़िस में सहकर्मियों के दोहरे संवादों से दो चार होना, कई बार ऐसी नज़रों का सामना करना जिन्हें देखकर लगे कि आंखें ही शायद काफी है बलात्कार करने के लिए। लेकिन, बावजूद इस सबके काम करना और हार नहीं मानना। साहस की इससे बड़ी परिभाषा शायद ही कोई हो....
11 comments:
good
verma
सड़क पर चलते हुए फब्तियाँ सुनना, अपने घरों के ओटलों पर बैठे लड़कों के मुंह से गाने सुनना, ऑफ़िस में सहकर्मियों के दोहरे संवादों से दो चार होना, कई बार ऐसी नज़रों का सामना करना जिन्हें देखकर लगे कि आंखें ही शायद काफी है बलात्कार करने के लिए। लेकिन, बावजूद इस सबके काम करना और हार नहीं मानना। साहस की इससे बड़ी परिभाषा शायद ही कोई हो....
सच लिखा है आपने
Exactly. I agree. A look on ur profile reveals that we like absolutely same films.
ab kya kiya jayee dipti je..aapne suna..hamari (delhi)mukhyamantri je ne kya kaha hai saumya ki maut par...kaha" raat ke teen baje saumya akeli kya karne niklee ? kyo niklee ? apni maut ki zimmedar khud saumya hai. WAH... isse jimmedari bhara bayan aur kya hoga...
verma
एक स्त्री को घर से बाहर निकलते ही तमाम किस्म की नजरो को नजरअंदाज करके ऑफिस पहुंचना होता है ....वैसे भी कामकाजी स्त्री जैसे सबकी बपोती होती है ओर अगर गरीब ओर जवान हो तो क्या कहने ?दरअसल अभी भी एक बहुत बड़ा वर्ग "इसी खास किस्म की पुरूष मानसिकता" से छुटकारा नही पाया है ...ओर यही स्थति कमोबेश हर शहर में है .
दुखद बात ये भी है की शीला दीक्षित ने भी कुछ अजीब सा बयान दिया है
जब मुख्यमंत्री तक के नजरिये का ये हाल है तो औरों का क्या कहा जाय।
अच्छी विश्लेष्णात्मक पोस्ट।
sheela dixit has given a very wrong statement and she should be ashamed of it
शीला दीक्षित सठियाई हुई हैं. उसे निकाल बाहर फ़ेंकना चाहिए।
इतनी मूर्खतापूर्ण बातें और वह भी स्त्री की संवेदनशीलता को बदनाम करने वाली! धिक्कार है ऐसी महिला व ऐसी नेता को। गोली तो ऐसे नेता को मार दी जानी चाहिए।एक दम अपढ़ और कुपढ़ मूर्खों जैसी सोच है।
अच्छा लिखा है, बुरा न मानें तो एक सुझाव देना चाहता हूं, ब्लॉग में कण्टेण्ट का कलर बदलें या फ़ॉण्ट बड़े करें… बैकग्राउण्ड के साथ मिक्स होता है और पढ़ने में आसान नहीं है…
बात तो पते कि है पर सबसे ज्यादा दुख तब होता है शायद जब कि कोई पढ़ा लिखा ऐसी हरकत करते हैं।
सही है.
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